29 अक्टूबर 2026 को नरक चतुर्दशी और दिवाली एक ही दिन मनाई जाएगी, जिसमें सुबह नरकासुर वध की पूजा और शाम को महालक्ष्मी पूजन होगा।
सुबह नरक चतुर्दशी का महत्व और पूजा
इस वर्ष 29 अक्टूबर 2026 को नरक चतुर्दशी और दिवाली दोनों पर्व एक साथ पड़ रहे हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, नरक चतुर्दशी के दिन भगवान श्री कृष्ण ने अत्याचारी नरकासुर का वध किया था और सोलह हजार से अधिक महिलाओं को मुक्त कराया था। इस विजय के स्मरण में सुबह सूर्योदय से पहले तेल लगाकर स्नान करना आवश्यक होता है।
इस दिन लोग सुबह जल्दी उठकर पानी में कुछ खास सामग्री मिलाकर स्नान करते हैं। इसके बाद यमराज के नाम का दीपक घर के मुख्य द्वार पर जलाया जाता है। ऐसा करने से घर में अकाल मृत्यु और सभी प्रकार के संकट दूर रहते हैं।
शाम को महालक्ष्मी पूजन और दीप जलाने की परंपरा
सुबह के अनुष्ठान पूर्ण होने के बाद शाम को माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। जब नरक चतुर्दशी और अमावस्या एक साथ पड़ती है, तो शाम को घरों को दीपों से सजाया जाता है और मां लक्ष्मी का स्वागत किया जाता है।
पूजा की थाली में नए कपड़े, फल, मिठाई और चांदी के सिक्के रखकर विधिवत पूजा की जाती है। इसके साथ ही घर के हर कोने में सरसों के तेल और घी के दीपक जलाए जाते हैं ताकि मां लक्ष्मी का वास हमेशा बना रहे। इस पूजा से जीवन में सुख-समृद्धि आती है और कष्ट दूर होते हैं।
दोनों पर्वों के संयोग में पूजा करने के नियम
जब नरक चतुर्दशी और दिवाली एक ही दिन पड़ते हैं, तो पूजा के नियमों को लेकर कई सवाल उठते हैं। इस स्थिति में सुबह यमराज की पूजा और दीपदान श्रद्धा पूर्वक करना चाहिए।
इसके बाद प्रदोष काल और अमावस्या की रात में मां लक्ष्मी की विधिवत पूजा की जाती है। इस प्रकार दोनों पर्वों के नियमों का पालन करने से घर में शांति, सुख और समृद्धि बनी रहती है और सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।
यह जानकारी ज्योतिष शास्त्र पर आधारित है। टीवी9 भारतवर्ष इसकी पुष्टि नहीं करता। सलाह के लिए astropatri.com से संपर्क करें।
स्रोत: tv9hindi.com





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