अहोई अष्टमी का व्रत इस साल रविवार, 1 नवंबर 2026 को रखा जाएगा। यह व्रत संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना के लिए किया जाता है। इस दिन माताएं निर्जला व्रत रखकर शाम को अहोई माता की पूजा करती हैं और तारों को अर्घ्य देती हैं। पूजा के बाद ही व्रत खोलने की परंपरा है।
महत्वपूर्ण तथ्य
- अहोई अष्टमी का व्रत संतान की खुशहाली के लिए होता है।
- स्याहू माला चांदी की होती है और इसे व्रत में पहनना शुभ माना जाता है।
- माला को पूजा के बाद ही पहनना चाहिए।
- माला उतारने का शुभ समय दिवाली के बाद लक्ष्मी पूजन के बाद होता है।
- मासिक धर्म के दौरान माला को स्वयं छूने से बचना चाहिए।
स्याहू माला का धार्मिक महत्व
अहोई अष्टमी पर पहनी जाने वाली चांदी की स्याहू माला माता और संतान के गहरे संबंध का प्रतीक है। यह माला संतान की लंबी उम्र और समृद्धि की कामना को दर्शाती है। माला लाल धागे, मौली या चांदी की चेन में पिरोई जाती है और इसमें चांदी के मनके तथा स्याहू के प्रतीक वाला लॉकेट होता है। कई परिवारों में हर साल या संतान की संख्या के अनुसार माला में नया चांदी का दाना जोड़ा जाता है।
माला पहनने का सही समय और तरीका
अहोई अष्टमी की शाम को पूजा में सबसे पहले स्याहू माला को अहोई माता के सामने रखा जाता है। इसके बाद रोली और अक्षत से माला की पूजा की जाती है। पूजा और कथा सुनने के बाद, तारों को अर्घ्य देने के बाद, महिलाएं माला पहनती हैं। माला पहनने से संतान के लिए किए गए व्रत और प्रार्थना का विशेष महत्व बढ़ जाता है।
माला पहनते समय इसे साफ-सुथरे तरीके से पहनना चाहिए। पूजा के दौरान माता का ध्यान करते हुए माला को लाल धागे, मौली या चांदी की चेन में पहनना शुभ होता है।
माला कब उतारनी चाहिए?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह माला अहोई अष्टमी से लेकर दिवाली तक पहनी जाती है। माला उतारने का शुभ समय दिवाली के दिन, लक्ष्मी पूजन के बाद माना जाता है। कुछ परिवारों में इसे गोवर्धन पूजा या भाई दूज के दिन भी उतारा जाता है।
माला उतारने के बाद उसे कच्चे दूध और गंगाजल से धोकर साफ किया जाता है। फिर माला को अच्छी तरह सुखाकर किसी साफ लाल कपड़े में लपेटकर सुरक्षित रखा जाता है ताकि अगले साल फिर से पूजा में इस्तेमाल हो सके। कई परिवार माला में नया चांदी का दाना जोड़कर उसे पुनः धारण करते हैं।
मासिक धर्म के दौरान स्याहू माला
कुछ परिवारों में यह मान्यता है कि यदि अहोई अष्टमी के दिन महिला के मासिक धर्म हो तो उसे माला या चांदी के दानों को छूना नहीं चाहिए। ऐसी स्थिति में परिवार का कोई दूसरा सदस्य माला को पूजा में रखकर पूजन करता है।
अहोई अष्टमी व्रत का महत्व
अहोई अष्टमी का व्रत संतान की लंबी उम्र, स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए किया जाता है। इस व्रत में माताएं निर्जला उपवास रखती हैं और अहोई माता की विधिपूर्वक पूजा करती हैं। चंद्रमा के बजाय तारों को देखकर अर्घ्य देना इस व्रत की खास परंपरा है। माना जाता है कि इससे माता का आशीर्वाद संतान पर बना रहता है।
इस तरह, स्याहू माला का पहनना और उतारना अहोई अष्टमी व्रत के दौरान एक महत्वपूर्ण धार्मिक क्रिया है, जो संतान की खुशहाली और परिवार की समृद्धि की कामना को दर्शाती है।
स्रोत: tv9hindi.com





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