रेलवे स्टेशन पर ट्रेन का प्लेटफॉर्म कैसे तय होता है?
रेलवे स्टेशन पर कई प्लेटफॉर्म होते हैं, जहां ट्रेनें आती और जाती हैं। लेकिन लोको पायलट को खुद से यह तय नहीं करना होता कि ट्रेन किस प्लेटफॉर्म पर रुकेगी। यह निर्णय स्टेशन के अधिकारियों द्वारा लिया जाता है।
स्टेशन मास्टर का रोल और सिग्नलिंग सिस्टम
ट्रेन के आने पर स्टेशन मास्टर के पास एक खास कंप्यूटर स्क्रीन होती है, जिसमें इंटरलॉकिंग सिस्टम लगा होता है। इस स्क्रीन पर स्टेशन के सभी ट्रैक और ट्रेनों की स्थिति दिखाई देती है। स्टेशन मास्टर खाली प्लेटफॉर्म देखकर कंप्यूटर से ट्रेन के रूट को सेट करता है। इसके बाद होम सिग्नल और रूट इंडिकेटर की लाइटों के जरिए लोको पायलट को सही रास्ते और प्लेटफॉर्म का पता चलता है।
लोको पायलट को ट्रेनिंग कैसे मिलती है?
लोको पायलट को केवल सिग्नल देखकर ही निर्णय नहीं लेना होता, बल्कि उन्हें पहले से रूट की ट्रेनिंग दी जाती है, जिसे 'रोड लर्निंग' कहा जाता है। इसमें उन्हें सिग्नल की जगह, ट्रैक के मुड़ने का स्थान और अन्य जरूरी जानकारियां सिखाई जाती हैं।
ट्रेन को सही जगह कैसे रोका जाता है?
ट्रेन को प्लेटफॉर्म पर सही जगह रोकने के लिए स्टॉपिंग बोर्ड लगाए होते हैं। इन बोर्डों पर 12, 18 या 24 कोच की संख्या लिखी होती है। लोको पायलट डिब्बों की संख्या के अनुसार ट्रेन को उसी बोर्ड के पास रोकते हैं ताकि ट्रेन सही स्थान पर रुके।
मुख्य तथ्य
- रेलवे स्टेशन पर ट्रेन का प्लेटफॉर्म स्टेशन मास्टर तय करते हैं।
- इंटरलॉकिंग सिस्टम वाली कंप्यूटर स्क्रीन से रूट सेट किया जाता है।
- लोको पायलट को 'रोड लर्निंग' के जरिए रूट की ट्रेनिंग दी जाती है।
- स्टॉपिंग बोर्ड के अनुसार ट्रेन को सही स्थान पर रोका जाता है।
स्रोत: hindi.asianetnews.com





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