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जगतगुरु शंकराचार्य ने कहा गोमाता की रक्षा के लिए कानून जरूरी

ज्योतिषपीठाधीश्वर स्वामी वासुदेवानन्द ने गोमाता की रक्षा के लिए कानून बनाने का आग्रह किया, संत समाज ने सनातन धर्म की सुरक्षा पर जोर दिया।

जगतगुरु शंकराचार्य ने कहा गोमाता की रक्षा के लिए कानून जरूरी

वाराणसी: सिगरा स्थित रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर में तीन दिवसीय संस्कृति संसद के उद्घाटन सत्र के अध्यक्ष ज्योतिषपीठाधीश्वर स्वामी वासुदेवानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि सनातन धर्म और संस्कृति को धर्म विरोधियों के हमलों से बचाने के लिए संस्कृति संसद का आयोजन आवश्यक है। उन्होंने गोमाता को भारतीय संस्कृति का आधार बताते हुए कहा कि गोमाता की रक्षा के लिए कानून बनना जरूरी है।

संस्कृति संसद में सनातन धर्म की रक्षा पर जोर

स्वामी वासुदेवानन्द सरस्वती जी महाराज ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि संस्कृति संसद में संत वक्ताओं के विचारों को लागू करना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि सनातन धर्म एवं संस्कृति पर चारों ओर हमले हो रहे हैं, इसलिए इनकी रक्षा के लिए ऐसे आयोजन महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने हिंदूविरोधी कानूनों में बदलाव की भी बात कही।

उन्होंने कहा कि गो, गंगा और गीता भारतीय समाज के प्रमुख स्तंभ हैं। गो अर्थात गाय हमारी संस्कृति का आधार है। गोमाता की रक्षा के लिए 1962 में श्री करपात्री जी महाराज के नेतृत्व में आंदोलन हुआ था, जिसमें सरकार की हिंसा के कारण करपात्री जी की एक आंख की रोशनी चली गई। वर्तमान में गोमाता की सुरक्षा हेतु कानून बनाना आवश्यक है और इसके लिए समाज और सरकार से आग्रह किया।

संत समाज सनातन धर्म की रक्षा में सक्रिय

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद् के अध्यक्ष श्री रविंद्रपुरीजी महाराज ने कहा कि भारत में संत समाज ने हमेशा धर्म की रक्षा की है और आगे भी करेगा। उन्होंने बताया कि अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद् और अखिल भारतीय संत समिति मिलकर देश में संत समाज को एकजुट कर भारतीय संस्कृति की रक्षा में योगदान दे रहे हैं।

उन्होंने कहा कि संपूर्ण भारत के संत समाज को एक मंच पर लाना संस्कृति संसद के माध्यम से संभव हुआ है, जिसमें सभी पंथों के संत शामिल हैं। संत समाज सनातन धर्म पर हो रहे षड्यंत्रों से बचाने के लिए तैयार है।

संस्कृति और धर्म विरोधी षड्यंत्रों की चिंता

अखिल भारतीय संत समिति और गंगा महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जीतेन्द्रानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि वर्तमान में अनेक षड्यंत्र हो रहे हैं। उन्होंने बताया कि भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म के खिलाफ संघर्ष का अखाड़ा दिल्ली बन गया है। कुछ व्यक्ति और संगठन लोकतंत्र को छोड़कर जंतर-मंतर के रास्ते सत्ता बदलने का प्रयास कर रहे हैं क्योंकि उन्हें सनातन धर्म की रक्षा में काम करने वाली सरकार पसंद नहीं।

उन्होंने संतों से कहा कि वे इस सच्चाई को समझें और धर्म विरोधी शक्तियों के खिलाफ काम करें। जैन धर्म के नाम पर युवकों को बांटना समाज के अनुरूप नहीं है। संत समाज ने युवकों से आग्रह किया है कि वे समाज और राष्ट्र के विकास में योगदान दें।

विविध नेताओं के विचार और आयोजन की जानकारी

विश्व हिंदू परिषद् के अंतर्राष्ट्रीय संरक्षक दिनेश जी ने कहा कि पूर्व की सरकारों ने ऐसे कानून बनाए जिससे हिंदू समाज और परिवार की भावना कमजोर हुई है। उन्होंने यूजीसी कानून, जाति विभाजन वाले कानून, लिव-इन-रिलेशनशिप और संपत्ति में बालिकाओं की भागीदारी से भाई-बहन विवाद जैसे मुद्दों पर आगे निर्णय लेने और कानून बदलने की आवश्यकता बताई।

विश्व हिंदू परिषद् के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक ने कहा कि हिंदुओं की संख्या घट रही है जबकि मुस्लिमों की जनसंख्या बढ़ रही है, जो असंतुलन पैदा कर रहा है। कथावाचक आचार्य सुधांशुजी महाराज ने कहा कि सनातन धर्म के लिए सजग रहना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि अंग्रेजों ने 7 लाख से अधिक गुरुकुलों को बंद कराया था, अब हमें उससे अधिक गुरुकुल बनाना होगा और संस्कार केंद्रों की जरूरत है।

आयोजन समिति के अध्यक्ष सुनील देवधरजी ने कहा कि 1914 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध लोकसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल के समर्थन में वामपंथी साहित्यकार और राष्ट्र विरोधी शक्तियों ने काशी में षड्यंत्र शुरू किया था। इन्हीं शक्तियों के प्रयासों को विफल करने के लिए संस्कृति संसद शुरू हुई जो अब भी जारी है।

कार्यक्रम दीप प्रज्ज्वलन से शुरू हुआ। मंचासीन संतों का माल्यार्पण सर्वश्री नील देवधर, प्रोफेसर अरविंद जोशी और प्रोफेसर ओमप्रकाश सिंह ने किया। संचालन संत समिति के कोषाध्यक्ष जनार्दन हरि ने किया। इस दौरान भारतीय संत समिति के अध्यक्ष कैवल्य पीठाधीश्वर जगद्गुरु अविचलदेवाचार्य जी महाराज, विश्व हिंदू परिषद् के अंतर्राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री चंपत राय जी, संत समिति के संयुक्त महामंत्री महामंडलेश्वर मनमोहन दास ‘डाॅ. रामनारायण द्विवेदी जी आदि उपस्थित थे। सत्र के अंत में संस्कृति पर्व पत्रिका का लोकार्पण किया गया।

स्रोत: jansandeshtimes.in

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