दिल्ली दंगों के आरोपी और जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद और शरजील इमाम ने दिल्ली हाईकोर्ट से राहत न मिलने पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। इन याचिकाओं में उनका मुख्य सवाल है कि बिना एक भी गवाह से पूछताछ किए छह साल से अधिक समय तक उन्हें जेल में कैसे रखा जा सकता है।
याचिका में ट्रायल में देरी और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन
दोनों कार्यकर्ताओं के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी है कि छह साल से वे बतौर अंडरट्रायल जेल में हैं, जबकि अभियोजन पक्ष के पास 900 से अधिक गवाह होने के बावजूद किसी से पूछताछ नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि ट्रायल की इस लंबी देरी से उनके आर्टिकल 21 के तहत मिलने वाले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है।
"आखिर बिना एक भी गवाह से पूछताछ किए किसी को इतने लंबे समय तक जेल में कैसे रखा जा सकता है?"
याचिका में यह भी बताया गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने नई जमानत याचिका दाखिल करने के लिए जो एक साल की समय सीमा तय की थी, वह समाप्त होने के करीब है।
दिल्ली पुलिस का आरोप: मास्टरमाइंड और वैचारिक ड्राइवर
दिल्ली पुलिस का कहना है कि उमर खालिद और शरजील इमाम इस खौफनाक साजिश के मास्टरमाइंड और वैचारिक ड्राइवर हैं। पुलिस ने पहले भी उनकी जमानत याचिकाएं खारिज कराई हैं।
ट्रायल कोर्ट ने 4 जुलाई को उनकी जमानत याचिका तीसरी बार खारिज की थी। इसके बाद दोनों ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया, जहाँ भी जमानत नहीं मिली क्योंकि कोर्ट सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और न्यायिक अनुशासन से बंधा हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने पहले कहा था कि यूएपीए के तहत इन दोनों की भूमिका अन्य आरोपियों से अलग है और वे इस मामले के "वैचारिक ड्राइवर" हैं।
यूएपीए कानून के तहत लंबी कैद और जमानत की शर्तों पर सवाल
यह मामला सिर्फ उमर खालिद और शरजील इमाम तक सीमित नहीं है। यूएपीए जैसे कड़े कानूनों के तहत बंद अन्य अंडरट्रायल कैदियों की लंबी कैद और जमानत की कड़ी शर्तों पर भी सवाल उठ रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही ऐसे मामलों को बड़ी बेंच के पास भेजा है, जो इस तरह की जमानत याचिकाओं पर फैसला करेगी। अब देखना होगा कि सुप्रीम कोर्ट इस नई याचिका पर क्या रुख अपनाता है और इन आरोपियों को राहत मिलती है या नहीं।
स्रोत: hindi.news18.com





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