यूपी में 2027 चुनाव से पहले BJP की रणनीति
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पुराने शासन की यादों को चुनावी मुद्दा बना रहे हैं। बीजेपी का यह कदम तब सामने आया है जब पार्टी करीब दस साल तक सत्ता में रहने के बाद भी अपने चुनावी विमर्श का बड़ा हिस्सा पूर्ववर्ती समाजवादी पार्टी (सपा) की आलोचना पर केंद्रित कर रही है।
बीजेपी का चुनावी विमर्श और ‘2017 से पहले’ की याद
बिहार विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के खिलाफ लालू-राबड़ी शासन के ‘जंगल राज’ को चुनावी मुद्दा बनाने के बाद यूपी में बीजेपी ने उसी रणनीति का उपयोग करते हुए सपा और अखिलेश यादव के शासन का ‘गुंडा राज’ वाला भय दिखाना शुरू कर दिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 2 नवंबर 2026 को गोंडा में आयोजित कार्यक्रम में सपा सरकार को प्रदेश के लिए 'श्राप' बताया और कहा कि जब भी सपा सरकार आई, अपराध, अराजकता और दंगे बढ़े। उन्होंने युवाओं से अपने माता-पिता से पूछने को कहा कि सपा के शासन में महिलाओं की सुरक्षा कैसी थी।
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भी बिहार चुनाव के दौरान नवंबर 2025 में लालू-राबड़ी के शासन की आलोचना की थी, लेकिन योगी लगभग दस साल सत्ता में रहने के बाद भी अपने शासन की उपलब्धियों के बजाय पूर्ववर्ती सरकार की याद दिला रहे हैं।
बीजेपी की प्रचार रणनीति के तीन हिस्से
बीजेपी की रणनीति में तीन मुख्य हिस्से शामिल हैं: योगी सरकार के कामकाज का प्रचार, सपा के कथित जंगल राज की याद दिलाना और योगी की व्यक्तिगत छवि का निर्माण। 30 अक्टूबर 2026 को लखनऊ में पार्टी की प्रदेश कार्यसमिति के दौरान अमित शाह ने 1990 में अयोध्या में कारसेवकों पर हुई गोलीबारी का मुद्दा उठाकर सपा को राजनीतिक रूप से कठघरे में खड़ा किया और कहा कि जनता सपा की अगली पीढ़ी को माफ नहीं करेगी।
डिजिटल प्रचार मंच ‘याद रखेगा यूपी’ पर 2017 से पहले के अपराध, माफियाराज और महिलाओं की असुरक्षा जैसी घटनाओं को समयरेखा के साथ दिखाया गया है। वहीं ‘नॉनस्टॉप यूपी’ और ‘फ्रेंड्स ऑफ योगी’ जैसे प्लेटफॉर्म पर योगी सरकार के कामकाज और मुख्यमंत्री की छवि को प्रचारित किया जा रहा है।
बिहार और यूपी की चुनावी परिस्थितियों में अंतर
बीजेपी को बिहार के चुनावी अनुभव से अतीत को चुनावी हथियार बनाने में मदद मिली है, लेकिन यूपी की परिस्थितियां अलग हैं। बिहार में लालू-राबड़ी शासन खत्म हुए लगभग दो दशक हो चुके थे, जबकि यूपी में अखिलेश यादव सरकार को केवल दस साल हुए हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा की 37 सीटों की जीत ने भी BJP के सामाजिक समीकरण की कमजोरी दिखाई है।
बिहार में बीजेपी ने नीतीश कुमार के सुशासन को विकल्प के रूप में पेश किया था, लेकिन यूपी में ऐसा कोई स्पष्ट विकल्प अभी नहीं दिख रहा।
अखिलेश यादव के शासन की दो तस्वीरें
2012 से 2017 के बीच सपा सरकार के दौरान कानून-व्यवस्था की समस्याएं थीं, जैसे पुलिस पर राजनीतिक दबाव, मुजफ्फरनगर दंगे और बुलंदशहर दुष्कर्म। हालांकि, इस दौरान आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे, लखनऊ मेट्रो, लैपटॉप वितरण और सामाजिक योजनाएं भी शुरू हुईं। लखनऊ में इकाना स्टेडियम, गोमती रिवरफ्रंट और महिला पावर हेल्पलाइन जैसी परियोजनाएं भी उस अवधि की पहचान हैं।
इसलिए पूरे पांच साल को सिर्फ ‘गुंडा राज’ कहना उस दौर की जटिलताओं को राजनीतिक नारे में सीमित करना होगा।
योगी सरकार के दस साल की उपलब्धियां और विवाद
योगी सरकार ने एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट, निवेश परियोजनाएं और कल्याणकारी योजनाओं में विस्तार किया है। माफिया और अपराधियों के खिलाफ सख्ती को सरकार प्रमुख उपलब्धि मानती है। हालांकि, बुलडोजर और एनकाउंटर की कार्रवाईयों की वैधता और प्रक्रिया पर सवाल उठते रहे हैं, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
धर्म और सांस्कृतिक मुद्दे जैसे मंदिर-मस्जिद विवाद, धर्मांतरण, लव जिहाद और कांवड़ यात्रा भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा हैं, जिन्हें अलग-अलग नजरिए से देखा जाता है। सामाजिक कार्यकर्ता अनिल चौधरी ने सवाल उठाया है कि क्या दस साल बाद सरकार के पास रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सद्भाव में ऐसी उपलब्धियां हैं जो उसे अपनी सबसे बड़ी पहचान बना सकें।
युवाओं की चिंताएं और सरकारी जवाबदेही
सरकारी भर्तियों में देरी, पेपर लीक, प्रतियोगी परीक्षाओं की अनिश्चितता और निजी क्षेत्र में नौकरी के अवसरों की कमी युवाओं के लिए गंभीर मुद्दे हैं। सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता, स्वास्थ्य सुविधाओं और किसानों की स्थिति का भी मूल्यांकन आवश्यक है।
विकास का अर्थ केवल इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं बल्कि रोजगार सृजन, निवेश की वास्तविकता और आम जनता के जीवन में बदलाव भी है।
अखिलेश यादव और भविष्य की चुनौती
अखिलेश यादव के सामने चुनौती है कि वे सिर्फ पुरानी आलोचनाओं का जवाब अपनी उपलब्धियों से न दें, बल्कि कमियों को स्वीकार कर भरोसा भी दें कि कानून-व्यवस्था बेहतर होगी। उन्हें सामाजिक समीकरण से आगे निकलकर पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों के लिए शिक्षा, रोजगार और सम्मान का ठोस कार्यक्रम पेश करना होगा।
राजनीतिक विश्लेषक की राय
राजनीतिक समीक्षक राजीव सिद्धार्थ का कहना है कि चुनाव में दोनों सरकारों के कार्यकाल और वादों का मूल्यांकन जरूरी है। किसी सरकार को केवल इसलिए जवाबदेही से नहीं बचना चाहिए कि उससे पहले की सरकार खराब थी। करीब दस साल सत्ता में रहने वाली पार्टी को अपने पूर्ववर्ती शासन का डर दिखाने की जरूरत क्यों पड़ रही है, यह बड़ा सवाल है।
मतदाता के लिए महत्वपूर्ण सवाल
2027 का चुनाव सिर्फ अतीत के कथित गुंडा राज और वर्तमान के दावों की तुलना तक सीमित नहीं होना चाहिए। मतदाताओं को रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, सामाजिक सद्भाव और कानून के शासन पर दोनों पक्षों से जवाब मांगना होगा। वोट देने के अधिकार पर खतरा सबसे बड़ा सवाल बन चुका है।
अखिलेश को अपने पांच साल का हिसाब देना होगा और योगी सरकार को अपने करीब दस साल का। लोकतंत्र में सरकारें केवल यह कहकर जवाबदेही से बच नहीं सकतीं कि उनसे पहले की सरकारें खराब थीं। सरकारें अतीत के डर से नहीं, भविष्य के भरोसे से चुनी जाती हैं।
स्रोत: navjivanindia.com





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