राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को 100 साल पूरे हो गए हैं। संघ ने हमेशा सामाजिक समरसता और सद्भावना पर जोर दिया है। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में विजयादशमी के अवसर पर अपने भाषण में इस बात पर बल दिया कि इतिहास की गलतफहमियों और संदेहों को दूर कर एकता और अपनापन को बढ़ावा देना जरूरी है। उन्होंने कहा कि सभी लोग हिंदू हैं, भले ही उनकी पूजा पद्धति अलग-अलग हो।
संघ की सद्भावना और एकता की भूमिका
RSS का पूर्व में सामाजिक समरसता पर ज्यादा फोकस रहता था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से उसने हर बड़े मंच से सद्भावना की बात कही है। संघ का मानना है कि इतिहास में जो कुछ भी हुआ, उससे मन में संदेह हो सकता है, लेकिन समाज में सद्भावना और एकता जरूरी हैं। इसे केवल बातों तक सीमित न रखते हुए व्यवहार में उतारना होगा। सामाजिक समरसता का मतलब है हिंदू समाज के अलग-अलग कथित वर्णों के बीच एकता, जबकि सद्भावना की परिभाषा में संघ के अनुसार सभी धर्मों के लोग भी शामिल हैं।
मोहन भागवत का विजयादशमी भाषण
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने विजयादशमी के अवसर पर कहा कि इतिहास से उत्पन्न हुई गांठें और आपसी अविश्वास समाज में तनाव पैदा करते हैं। उन्होंने बताया कि छोटी-छोटी बातों पर समाज को उकसाने की कोशिशें बढ़ रही हैं, जिन्हें रोकना आवश्यक है। संदेह दूर करने और नए विवादों से बचने के लिए सद्भावना और अपनापन जरूरी है। भागवत ने कहा कि सभी के लिए यह संदेश महत्वपूर्ण है क्योंकि संघ की BJP की राजनीति और राष्ट्रीय वैचारिक बहस में अहम भूमिका है।
इतिहास, धर्म और पहचान का राजनीति में प्रभाव
भारत में इतिहास, धर्म और पहचान से जुड़े मुद्दे लंबे समय से राजनीति का हिस्सा रहे हैं। हर समुदाय की इन मुद्दों पर अपनी अलग धारणा है और राजनीतिक दल इन्हें अपने नजरिए से उठाते रहे हैं। ऐसे में मोहन भागवत की अपील खास महत्व रखती है। संघ के सौ वर्ष पूरे होने के बाद इसके सामाजिक प्रभाव और विस्तार दोनों बढ़े हैं। BJP के सत्ता में आने के बाद संघ की विचारधारा से जुड़े मुद्दों पर राष्ट्रीय राजनीति में चर्चा पहले से ज्यादा बढ़ी है। संघ प्रमुख के संदेशों का असर राजनीतिक घटनाओं में लोगों की प्रतिक्रियाओं से ही स्पष्ट होगा।
उकसावे की राजनीति से सचेत रहने की जरूरत
भागवत ने शासन-प्रशासन के व्यवहार पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी अभियान या नीति को लागू करते समय नागरिकों के सम्मान का ध्यान रखना जरूरी है। सरकारों और राजनीतिक नेतृत्व को भी व्यवहार में भद्रता बनाए रखनी चाहिए ताकि कोई अपमानजनक स्थिति न बने। इसके बिना नीति का प्रभाव कम हो सकता है।
सोशल मीडिया और संयम की अपील
मोहन भागवत ने विशेष रूप से छोटी-छोटी बातों पर समाज को उकसाने वालों से दूर रहने की सलाह दी। सोशल मीडिया के जमाने में अधूरी जानकारी, भड़काऊ संदेश और पुराने विवाद से जुड़े वीडियो तेजी से फैलते हैं। राजनीतिक दलों के समर्थक भी कभी-कभी इसका हिस्सा बन जाते हैं। इसलिए संयम और समझदारी से काम लेना जरूरी है। भागवत की यह अपील समाज के हर वर्ग के लिए महत्वपूर्ण है।





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