सारांश: PoK में बढ़ता अलगाववाद और स्थानीय नाराजगी भारत के लिए एक मौका है, जबकि पाकिस्तान की कश्मीर नीति की पोल खुल रही है।
फारूक अब्दुल्ला का कश्मीर मुद्दे पर बयान
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने एक बार फिर कश्मीर का मुद्दा उठाया है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार उनकी मदद नहीं कर सकती और पड़ोसी देश हर जगह कश्मीर का मुद्दा उठा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान अपनी नाकामी छुपाने के लिए जम्मू-कश्मीर की बात करता रहता है। फारूक अब्दुल्ला ने बताया कि पाकिस्तान का निर्माण शुरू से ही एक गलत कल्पना थी। 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर मौजूदा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) सहित पूरे जम्मू-कश्मीर को भारत का हिस्सा बनाया था। उन्होंने स्पष्ट किया था कि वे पहले भारतीय हैं और फिर महाराजा।
कश्मीर पर पाकिस्तान के शुरुआती विचार
पाकिस्तान के शुरुआती विचारों में कश्मीर शामिल नहीं था। 1930 में मुस्लिम लीग के अधिवेशन में मोहम्मद इकबाल ने पंजाब, उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत, सिंध और बलूचिस्तान को मिलाकर एक राज्य बनाने की बात कही थी, जिसमें कश्मीर और बंगाल का कोई जिक्र नहीं था। 21 जून 1937 को मोहम्मद अली जिन्ना के साथ पत्राचार के दौरान इकबाल की राजनीतिक रुचि भारतीय मुसलमानों से जुड़े सवालों की ओर दिखाई दी।
पाकिस्तान में अलगाववाद की आवाजें
पाकिस्तान बनने के बाद भाषाई और राजनीतिक अधिकारों को लेकर कई संघर्ष हुए। बंगाली भाषियों पर उर्दू और अरबी थोपना इसका कारण था, जिसके चलते 1971 में पूर्वी पाकिस्तान अलग होकर बांग्लादेश बना। आज भी पाकिस्तान में अलगाववाद की आवाजें सुनाई देती हैं। सिंध में सिंधुदेश की मांग और बलूचिस्तान में आजादी की मांग इसके उदाहरण हैं। बलूच संगठनों का आरोप है कि पाकिस्तानी हुक्मरान उनके संसाधनों का दोहन कर उनकी पहचान दबा रहे हैं।
खैबर पख्तूनख्वा और PoK में बढ़ती नाराजगी
खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में भी हालात बिगड़ रहे हैं, जहां तहरीक-ए-तालिबान जैसे आतंकी संगठनों से मुकाबला चल रहा है। पख्तून लंबे समय से संयुक्त भारत या स्वतंत्र पख्तूनिस्तान की मांग कर रहे हैं, लेकिन पाकिस्तान सुरक्षा व इस्लाम खतरे का हवाला देकर उनकी भावनाएं खारिज करता है। पाक अधिकृत कश्मीर में भी सैन्य दखल और सीमित नागरिक अधिकारों को लेकर नाराजगी बढ़ी है।
PoK में विरोध के कारण
अब PoK में लोग बिजली और सस्ते गेहूं के लिए नहीं बल्कि शासन एवं राजनीतिक प्रतिनिधित्व के संकट के कारण प्रदर्शन कर रहे हैं। 2023 में शुरू हुए आंदोलन में जम्मू-कश्मीर संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) ने अहम भूमिका निभाई है। जुलाई 2026 के चुनावों में 12 आरक्षित विधानसभा सीटों को लेकर विवाद हुआ, जिसमें JAAC का आरोप है कि ये सीटें स्थानीय सरकार को प्रभावित करती हैं और इन्हें खत्म या बदलने की मांग की जा रही है।
बेरोजगारी और आर्थिक चुनौतियां
PoK में निर्वाचित सरकार होने के बावजूद कई फैसले लेने का अधिकार नहीं है। 2018 के संशोधन से प्रशासनिक और विधायी शक्तियां स्थानीय परिषद से मुजफ्फराबाद को मिलीं, लेकिन नियंत्रण पाकिस्तान सरकार के पास है। विकास के लिए बजट भी 75 अरब से घटाकर 63 अरब रुपये कर दिया गया है। ईंधन सब्सिडी में भी कटौती हुई है। क्षेत्र में बेरोजगारी दर 11% है, जबकि महिलाओं में 23% और युवाओं में 27% है। सीमित अधिकारों और घटते बजट के बीच रोजगार और विकास बड़ी चुनौतियां हैं।
भारत की चिंता और उठते सवाल
इन विरोध-प्रदर्शनों ने सवाल उठाए हैं कि जब बड़े फैसले इस्लामाबाद लेता है, तो PoK में स्थानीय स्वशासन का क्या मतलब है। भारत ने वहां नागरिकों की मौतों और सुरक्षाबलों की कार्रवाई पर चिंता जताई है। जून से अब तक कम से कम 90 लोगों की जान जा चुकी है। कुछ प्रदर्शनकारियों ने भारतीय तिरंगा लहराकर मदद मांगी है। ये घटनाएं 22 फरवरी 1994 को भारतीय संसद के उस प्रस्ताव की याद दिलाती हैं, जिसमें PoK और गिलगित-बाल्टिस्तान सहित उन क्षेत्रों पर भारत के दावे को दोहराया गया है जो पाकिस्तान के कब्जे में हैं। भारत को अब पाकिस्तान के प्रोपेगैंडा को उजागर करना होगा ताकि उसकी राजनीतिक प्रतिबद्धता सामने आए।
(लेखक स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज, जेएनयू में प्रोफेसर हैं)





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