करवा चौथ का व्रत हिंदू धर्म में पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि की कामना से जुड़ा है। इस दिन सुहागिन महिलाएं सूर्योदय से चंद्रमा उदय तक निर्जला व्रत रखती हैं और भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश तथा करवा माता की पूजा करती हैं। माता पार्वती की पूजा का करवा चौथ पर विशेष महत्व माना जाता है। उन्हें अखंड सौभाग्य, प्रेम, समर्पण और वैवाहिक सुख का प्रतीक माना गया है। इनके एक नाम "अपर्णा" के पीछे त्याग और तपस्या की एक पौराणिक कथा छिपी है।
माता पार्वती को अपर्णा क्यों कहा गया?
पौराणिक कथाओं के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनके मन में शिव के प्रति गहरी श्रद्धा और समर्पण था। इस तपस्या के दौरान उन्होंने सुख-सुविधाओं का त्याग कर एकांत में साधना की। शुरुआत में वे कंद-मूल और फल खाकर तपस्या करती थीं। धीरे-धीरे उन्होंने भोजन की मात्रा कम कर दी और केवल पेड़ों से गिरने वाले सूखे पत्तों पर निर्भर हो गईं।
एक समय ऐसा भी आया जब माता पार्वती ने सूखे पत्तों को खाना भी छोड़ दिया। संस्कृत में पत्ते को "पर्ण" कहा जाता है। जब उन्होंने पर्ण का भी त्याग किया, तो उन्हें "अपर्णा" कहा जाने लगा। यह नाम उनके संकल्प, धैर्य और तपस्या का प्रतीक है। इस कथा से पता चलता है कि माता पार्वती न केवल शक्ति और सौंदर्य की देवी हैं, बल्कि दृढ़ इच्छाशक्ति और समर्पण की मूर्ति भी हैं।
करवा चौथ के निर्जला व्रत का माता पार्वती की तपस्या से संबंध
करवा चौथ पर सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। वे पूरे दिन अन्न और जल का त्याग करती हैं और चंद्रमा के दर्शन के बाद पूजा कर व्रत खोलती हैं। माता पार्वती की कठोर तपस्या की कथा उनके दृढ़ संकल्प और त्याग को दर्शाती है, जिसके कारण उनकी पूजा करवा चौथ पर विशेष महत्व रखती है। महिलाएं उनसे वैवाहिक जीवन में प्रेम, विश्वास, सौभाग्य और सुख की कामना करती हैं।
करवा चौथ 2026 पर पूजा कब होगी?
पंचांग के अनुसार, साल 2026 में करवा चौथ का व्रत 29 अक्टूबर, गुरुवार को रखा जाएगा। इस दिन सुहागिन महिलाएं सुबह से निर्जला व्रत रखेंगी और शाम को परंपरा अनुसार करवा चौथ की पूजा करेंगी। रात में चंद्रमा के दर्शन करके अर्घ्य दिया जाएगा और पति के हाथों जल ग्रहण कर व्रत खोला जाएगा।





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