उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में करीब 40 साल पुराने मकान मालिक और किरायेदार के विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए मकान मालिक की जरूरत को मान्यता दी और किरायेदार को 30 दिन के भीतर मकान खाली करने का निर्देश दिया है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश रद्द, निचली अदालत का फैसला बहाल
जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मार्च 2025 के आदेश को निरस्त कर दिया। हाईकोर्ट ने किरायेदार को राहत दी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को पलटते हुए निचली अदालत का बेदखली आदेश बहाल किया।
- कोर्ट ने किरायेदार को मकान मालिक को 30 दिनों के भीतर संपत्ति का शांतिपूर्ण कब्जा सौंपने को कहा।
- साथ ही 30 दिन में बकाया किराया और वर्तमान किराया चुकाने का निर्देश दिया गया।
पीलीभीत की संपत्ति विवाद की शुरुआत और मकसद
यह मामला जुलाई 1984 से शुरू हुआ जब मकान मालिक ने पीलीभीत की संपत्ति खरीदी थी। मकान मालिक ने ‘यूपी शहरी भवन अधिनियम, 1972’ के तहत नोटिस भेजकर तीन साल के अंदर दुकान खाली करने को कहा था।
2010 में मकान मालिक ने बेदखली याचिका दायर की, जिसमें बताया गया कि उन्हें अपने न्यूरोसर्जन बेटे के लिए मेडिकल क्लिनिक खोलना है।
हालांकि 2012 में सक्षम प्राधिकारी ने मकान मालिक के पक्ष में फैसला दिया, लेकिन मामला कई वर्षों तक अपीलों में फंसा रहा।
सुप्रीम कोर्ट का कहना: देरी से मकान मालिक की जरूरत खत्म नहीं होती
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चार दशकों से जगह खाली न होने की वजह से मकान मालिक का बेटा अपना क्लिनिक शुरू नहीं कर पाया।
- कोर्ट ने कहा कि तकनीकी और कानूनी अड़चनों के चलते बार-बार नई प्रक्रिया शुरू करना "न्याय का मजाक उड़ाने" जैसा होगा।
- पीठ ने स्पष्ट किया कि समय बीत जाने से मकान मालिक की वास्तविक और जायज जरूरत खत्म नहीं हो जाती।
स्रोत: hindi.asianetnews.com





टिप्पणियाँ
इस खबर पर सबसे पहले अपनी टिप्पणी करें।