केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान ने विकसित किया जामुनी रंग का नया आलू
उत्तर भारत के मैदानी इलाकों के लिए 2024 में जारी की गई नई आलू की किस्म कुफरी जामुनिया शरीर में खून की कमी को 5 गुना तेजी से दूर कर सकती है। यह जामुनी रंग का आलू आयरन, विटामिन-C और जिंक में आम पीले आलू से कई गुना अधिक है।
मुख्य तथ्य
- कुफरी जामुनिया में 3.22 mg आयरन, आम आलू में 0.57 mg।
- विटामिन-C की मात्रा 42.75 mg, आम आलू में 23.15 mg।
- जिंक की मात्रा 2.28 mg, आम आलू में 0.28 mg।
- 90 दिन में प्रति हेक्टेयर 49 टन तक उपज।
- बायोफोर्टिफिकेशन तकनीक से बिना केमिकल के तैयार।
कुफरी जामुनिया क्यों है आम आलू से बेहतर?
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (CPRI) ने इस खास किस्म को तैयार किया है। इसमें आयरन की मात्रा 3.22 mg है, जो सामान्य पीले आलू के 0.57 mg से लगभग 5 गुना अधिक है। इसका मतलब है कि यह खून की कमी या एनीमिया को जल्दी दूर करने में मदद कर सकता है।
इसी तरह, आम आलू में 23.15 mg विटामिन-C होता है जबकि इस जामुनी आलू में 42.75 mg है, जो रोग प्रतिरोधक क्षमता को दोगुना बढ़ाने में सहायक है। इसके अलावा, जिंक की मात्रा भी 2.28 mg है, जो बच्चों के मस्तिष्क और हड्डियों के विकास के लिए जरूरी है।
जामुनी रंग इसके एंथोसायनिन (Anthocyanins) नामक प्राकृतिक एंटीऑक्सिडेंट की वजह से है, जो शरीर को कई गंभीर बीमारियों से बचाता है।
छिपी भूख और एनीमिया के लिए समाधान
भारत में कई लोग दिन में तीन बार खाना खाने के बावजूद जरूरी विटामिन्स और मिनरल्स की कमी से पीड़ित हैं, जिसे छिपी भूख कहते हैं। आधे से ज्यादा महिलाएं और दो-तिहाई बच्चे एनीमिया से जूझ रहे हैं।
कुफरी जामुनिया इस समस्या का सस्ता और असरदार इलाज हो सकता है क्योंकि इसे सामान्य आलू की तरह पकाया और खाया जाता है। यह आलू सब्जी, पराठा या करी के रूप में आसानी से इस्तेमाल हो सकता है।
बिना रासायनिक पदार्थ के उगाया गया आलू
यह जामुनी आलू बायोफोर्टिफिकेशन तकनीक से तैयार किया गया है, जिसका मतलब है कि खेती के दौरान प्राकृतिक रूप से इसके बीजों में विटामिन और मिनरल्स बढ़ाए गए हैं। इसमें कोई रसायन या दवा मिलाई नहीं गई है। इससे पहले ICAR-CPRI ने कुफरी नीलकंठ और कुफरी माणिक जैसी रंगीन आलू की किस्में विकसित की हैं।
किसानों के लिए फायदे और उपज
किसानों को प्रति हेक्टेयर 32 से 35 टन उपज की सलाह दी जाती है, जबकि परीक्षणों में 90 दिन की अवधि में 49 टन प्रति हेक्टेयर तक उपज मिली है। लगभग 90% आलू बाजार में बेचने योग्य पाए गए हैं। इस किस्म की स्टोरेज क्वॉलिटी भी अच्छी है और इसे खास तौर पर उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में उगाने की सलाह दी गई है।
क्या आम जनता तक पहुंचेगा कुफरी जामुनिया?
वैज्ञानिकों ने खेतों में इस आलू की पैदावार को शानदार बताया है। सरकार और कृषि विभाग इस आलू के बीज ज्यादा से ज्यादा किसानों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। अगर इसे मिड-डे मील और आंगनवाड़ी केंद्रों में शामिल किया गया तो भारत में खून की कमी और कुपोषण को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
स्रोत: hindi.asianetnews.com





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